मायावती को क्यों नहीं भाता किसी का साथ?

हरियाणा विधानसभा चुनाव में BSP अकेले चुनाव लड़ेगी। JJP से गठबंधन तोड़ने के बाद वो किसी अन्य पार्टी के साथ हाथ नहीं मिलाएगी। बसपा हरियाणा की सभी 90 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। हालांकि बसपा ने हरियाणा में कई दलों को साथी जरूर बनाया, लेकिन गठबंधन लंबा नहीं चल पाया। पार्टी सुप्रीमो मायावती को किसी का साथ ज्यादा भाता भी नहीं है। इनेलो, लोसपा और अब जेजेपी का साथ छोड़ बसपा ने ये साबित कर दिया है।

हरियाणा में बसपा ने 1998 में इंडियन नेशनल लोकदल के साथ गठबंधन किया था। 2009 में कुलदीप बिश्नोई की हरियाणा जनहित कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। मई 2018 में फिर से इंडियन नेशनल लोकदल के साथ मिलकर चलने का फैसला किया गया, लेकिन यह गठबंधन 9 महीने बाद ही टूट गया। जींद उपचुनाव में करारी हार के बाद बसपा का इनेलो का अस्तित्व खतरे में नजर आने लग गया। इनेलो के साथ गठबंधन तोड़कर फरवरी 2019 में राजकुमार सैनी की लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी का साथ लेने का मन बनाया है। हालांकि यह गठबंधन भी ज्यादा दिन नहीं चल पाया।

प्रदेश में बसपा का वोट प्रतिशत 2014 के विधानसभा चुनाव में 4:4 प्रतिशत रहा था। 2009 में 6:74 प्रतिशत और 1996 व 2000 में क्रमश: 5:44, 5:74 प्रतिशत वोट पार्टी को मिले थे। बसपा का हर विधानसभा क्षेत्र में वोट बैंक है और पार्टी उम्मीदवार किसी भी बड़े दल के प्रत्याशी का चुनावी गणित बिगाड़ देते हैं।

इस बार भी बसपा सभी विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने जा रही है। बसपा उम्मीदवार कड़े मुकाबले वाली सीटों पर जीत-हार में अहम भूमिका निभाएंगे। उन्हें मिलने वाले वोट भाजपा, कांग्रेस उम्मीदवारों में से किसी को भी विधानसभा पहुंचने से रोक सकते हैं।

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